जब मैं तन्हा होता हूँ, मैं जब अक्सर तन्हा होता हूँ, दो पल सब कुछ भूल कर खुद से बाते कर लेता हूँ, चीखते चिलाते इस शोर में खामोशी कि आवाज़ सुन लेता हूँ, तोड़ मन कि सब जंजीरे आज़ाद पंछी सा उड़ लेता हूँ बीते पलो के बिखरे मोती यादो में पिरो लेता हूँ, नहीं पता कैसे, बीत गये इतने बरस जिंदगी के,इसलिए मैंने क्या खोया,क्या पाया इसका हिसाब लगा लेता हूँ, मैं जब अक्सर तन्हा होता हूँ, मेरे दिल में तमन्नाये तो बहुत उमड़ती है, पर हर बार कि तरह मैं खुद को समझा लेता हूँ, चला तो बहुत था मैं चले जाने के लिए पर अपने साये को, हर बार उसी मोड़ पे पा लेता हूँ, और कभी कभी तन्हाई में खुद से बाते कर के, खुद ही पर हँस लेता हूँ जब मैं तन्हा होता हूँ ! !
"MANN"
No comments:
Post a Comment