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Tuesday, March 16, 2010

तन्हाई ! ! ! !

आज भी शाम उतरी तो है आँगन में, लेकिन तुम्हारी पायल की आवाज शायद जीने पे भूल आयी है, 
और रात जाने क्यूँ खड़ी है खिड़की में? शायद नाराज है या शरमाती है अन्दर आने में, 
नींद भी दस्तक तो देना चाहती है पलकों पे, बस खुली आँखों में उतरना इसकी फितरत नहीं.
..और ख्वाब? वो तो सभी तुम्हारे थे, अब तुम नहीं तो ख्वाब कहाँ? 
आज की शब् तुम्हारे सिवा सभी कुछ अपनी जगह पर है, पर थोडा कुछ कम होने से कितना कुछ कम लगता है..




"MANN"

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